बस्ती में लो नहीं वो बाती देकर खुद को खुदा समझने लगे थे कुछ लोग ही सही मगर ख़ुश न थे वो शहंशाह होकर खुद को खुदा समझने लगे थे कुछ टोपी वाले जो पहुंचे हिन्दुस्तान में, हिन्दुस्तान में आकर खुद को खुदा समझने लगे थे वो शान से तोड़ते रहे पुरानी इमारतें फिर इक नई बनाकर ख़ुद को खुदा समझने लगे थे वो न समझते थे दिलों की धड़कनों को किसी को आजमाकर खुद को खुदा समझने लगे थे हाथ जो आया सब ऐंठ गए जा भवनों में सबसे उपर बैठ गए अपनी हैसियत से किसी को उठाया नहीं हर किसी को गिराकर खुद को खुदा समझने लगे थे पटेल , गांधी , को समझ धूल गए अपने ही असूल भूल गए भगत सिंह को फांसी चढ़ा कर खुद को खुदा समझने लगे थे भूख से सब मरने लगे , अंग्रेज अपना खजाना भरने लगे, देश को लुटकर, कमाने वाले खुद को खुदा समझने लगे थे वो जो खेल खेल में खेलते रहे सरहद ए हिंदुस्तान से , सर जमीन को तोड़ बांटकर खुद को खुदा समझने लगे थे फिर एक पल हम आजाद हुए, दिलवाई आज़ादी जिन्होंने , हीरे वो नायाब हुए खुद को खुदा समझने वाले, अब उनसे जलने लगे थे, देश को तो बांटकर भी हाथ मलने लगे थे कुछ ऐसे भी लोग थे खुद को ख़...